सच्चे भक्त बनकर करना चाहिए भक्ति, भिखारी बनकर नहीं: विनय सागर

48 दिवसीय भक्ताम्बर विधान में इन्द्रा-इन्द्राणियों भजनों के साथ भगवान जिनेन्द्र के समक्ष समर्पित किए महाअघ्र्य

भिण्ड, 02 अगस्त। भगवान की भक्ति करने वाले सच्चे भक्तों के जीवन में बिन मांगे मोती मिले वाली कहावत चरितार्थ होती है। भक्ति सच्चे भक्त बनकर करना चाहिए, भिखारी बनकर नहीं। संत-समागम, परमात्मा की भक्ति, विनय एवं अतिथि सतकार करना, हित-मित मधुर वाणी बोलना, शुद्ध आचार-विचार एवं शुद्ध आहार रखना, संतान को संस्कारवान बनाना, ईमानदार मित्र बनना एवं बनाना, ये सुख-शांति एवं समृद्धिशाली परिवार बनाने के मुख्य सूत्र हैं। यह उदगार श्रमण मुनि विनय सागर महाराज ने संस्कारमय पावन वर्षायोग समिति एवं सहयोगी संस्था जैन मिलन परिवार के तत्वावधान में बुधवार को महावीर कीर्तिस्तंभ मन्दिर में आयोजित 48 दिवसीय भक्ताम्बर महामण्डल विधान में धर्मसभा को सांबोधित करते हुए व्यक्त किए।
मुनि विनय सागर महाराज ने कहा कि चैत्य का अर्थ प्रतिमा होता है और प्रसाद का अर्थ भवन होता है। जहां प्रतिमा विराजित हो उसे चैत्यालय मन्दिर या देवालय कहते हैं। जैसे किसी कागज के टुकडे पर भारतीय रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के गवर्नर के हस्ताक्षर एवं सील लगा देने से मुद्रा बन जाती है। वैसे ही पदलित अपावन भी आचार्य के मंत्ररूपी सील लगाने से पूज्य परमात्मा बन जाता है। जैसे एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य के अभाव में भी मिट्टी की मूर्ति को गुरू मानकर धनुष विद्या की सिद्धि कर ली। वैसे ही प्रतिमा स्थापित कर के भक्त मोक्ष की सिद्धि कर लेता है। जैसे राम के वनवास होने पर भरत ने चरणपादुका रखकर उन्हें ही राजा की प्रतीक मान कर राज्य संचालन किया, वैसे ही साक्षात भगवान के अभाव में, उनकी प्रतिमा रखकर धर्मतीर्थ का संचालन, पूजा-पाठ आदि क्रिया करके किया जाता है।
संसार से पार लगाने वाले देव, गुरू और शास्त्र हैं, इन पर श्रृद्धा करना
मुनि विनय सागर महाराज ने कहा कि संसार से पार लगाने वाले देव, गुरू और शास्त्र हैं। इन तीनों पर श्रृद्धा करना सम्यक दर्शन कहलाता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र इन तीनों को धारण करके परमात्मा से मिलन किया जा सकता है, अथवा यही तीन आत्मा को परमात्मा बनाते हैं। संसार में झगडे की तीन जड होती हैं। कहा भी है जर (धन), जोरू (पत्नी), जमीन, झगडे की जड तीन हैं। आदमी के अंदर तीन चीजें क्रोध पैदा करती हैं, स्वामित्व, कर्तव्य एवं भोगतृत्व शक्तिशाली बनाती है। साधु साधना में जुटे, लोकप्रिय बनने में नहीं। लोकप्रिय बनने की चाहत साधुओं की साधना में बाधक होती है। आपा खो जाना मानसिक कमजोरी है। खुद पर काबू पा जाना आध्यात्मिक साधना है। सहयोग/ परोपकार की भावना व्यक्ति के विशाल हृदय की परिचायक है।
मुनि ने मंत्रों से भगवान जिनेन्द्र का कराया अभिषेक, हुई शांतिधारा
प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि श्रमण मुनि विनय सागर महाराज के सानिध्य एवं विधानचार्य शशिकांत शास्त्री ग्वालियर के मार्गदर्शन में केशरिया वस्त्रों में इन्द्रों ने मंत्रों के साथ कलशों से भगवान आदिनाथ का जयकारों के साथ अभिषेक किया। मुनि ने अपने मुखारबिंद मंत्रों से भगवान आदिनाथ के मस्तक पर पदम चंद जैन परिवार ने शांतिधारा की। मुनि को शास्त्र भेंट समजा जनों ने सामूहिक रूप से किया। आचार्य विराग सागर, विनम्र सागर के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन पदम चंद, रवि, सौरभ जैन बितौली वाले परिवार ने किया।
भक्ताम्बर महामण्डल विधान में पूजन के साथ चढ़ाए महाअघ्र्य
श्रमण मुनि विनय सागर महाराज के सानिध्य में विधानचार्य शशिकांत शास्त्री ने भक्ताम्बर महामण्डल विधान में पदमचंद, रवि, सौरभ जैन बितौली वाले परिवार एवं इन्द्रा-इन्द्राणियों ने भक्ताम्बर मण्डप पर बैठ कर अष्टद्रव्य से पूजा अर्चना कर संगीतमय भजनों पर भक्ति नृत्य करते हुए महाअध्र्य भगवान आदिनाथ के समक्ष मण्डप पर समर्पित किए।