झुग्गी झोंपड़ी वाली महिला अधिकारी संगीता तोमर

महिला दिवस (08 मार्च) पर विशेष-

भिण्ड, 07 मार्च। ऐसे बहुत ही कम अधिकारी देखे जाते हैं जो अपने दायित्वों के निर्वहन के साथ गरीबों की झोंपडिय़ों और मोहल्लों में उनके बच्चों के लिए अपने परिवार जैसा ही समझते और व्यवहार देते हों। अधिकारियों में भी महिला, जो अपने प्रशासनिक कार्यों और दायित्वों के निर्वहन के साथ अपने परिवार और अपने खाने-पीने, कपड़े साफ रखने आदि को भी स्वयं देखते और करते हैं। और वास्तव में ऐसी गिनी-चुनी महिला अधिकारी धन्य तो हैं ही, सराहनीय-सम्माननीय और प्रेरक भी कही जा सकती हैं। क्योंकि फिर वह अकेली नहीं होती, उनके साथ चलने वाली अन्य महिलाएं-लड़कियां तथा पुरुष भी साथ होते और जुडऩे लगते हैं। ऐसी एक मात्र पीएचई विभाग भिण्ड में पदस्थ जिला सलाहकार अधिकारी हैं- श्रीमती संगीता तोमर।
पांच जुलाई सन् 1983 को मुरैना में जन्मीं संगीता तोमर कहती हैं कि पिता टीएस तोमर और माता श्रीमती शकुन्तला तोमर ने जब विषम स्थितियों में उन्हें पढ़ाया और गरीब तथा पिछड़े बच्चों को भी सहयोग किया, तो उनके मन में गरीब और बेसराहा बच्चों के सहयोग और सम्वर्धन का विचार घर कर गया, जिसे वह अब अपना जुनून मानती हैं।


भिण्ड में बस स्टेण्ड के पीछे झुग्गी-झोंपड़ी वाले कुछ परिवार हैं। उनके बच्चे निरुद्देश्य खेलते और घूमते फिरते हैं, तो संगीता तोमर उनके परिवार वालों से मिलीं। चर्चा की। बच्चों देखा। उनके बीच चाकलेट बांटी, तो सारे झोपड़ पट्टी वाले बच्चे एकत्रित हो गए। उनमें से कुछ बच्चे साफ-सुथरे, सामान्य तथा होनहार भी दिख। तब संगीता तोमर ने उन्हें अवकाश के दिन और ड्यूटी समय के बाद आकर एक स्थान पर बिठाला। उससे पूर्व बच्चों से उस स्थान की सफाई करवाई। सामान्य ज्ञान और पढ़ाई से संबंधित प्रश्नोत्तर रूप में चर्चा भी की। जब चलने लगीं तो सभी को एक-एक चॉकलेट दी और उस स्थान तथा झोपड़-पट्टी की जगह को साफ-सुथरा करके रखने की बात भी कही।
जब संगीता तोमर पुन: झुग्गी-झोंपड़ी पहुंची, तो उनका-बच्चों का चिन्हित स्थान साफ-सुथरा मिला। झोपडिय़ों वाला परिसर भी साफ नजर आया। प्रसन्नता हुई कि झुग्गी वाले गरीब बच्चे तिरस्कार की दृष्टि से अनपढ़, गंवार, आवास समझे जाते थे, तो सामान्यों से भी बेहतर लगते हैं। बस, मानवता की पाठशाला शुभारंभ हुई। अवकाश के दिनों में उनकी कक्षायें लगने लगीं। बुद्धि-विवेक के ज्ञान से टोली या कक्षायें संचालित हो रही हैं। कुछ बच्चों के एडमीशन सरकारी स्कूल में भी दर्ज हो गए है। उन्हें पाठ्य सामग्री नि:शुल्क देते हैं।
झुग्गी के बच्चों, पुरुषों, महिलाओं को एकत्रित पुराने कपड़े भी दिए जाते हैं। कभी-कभी सर्दियों में नये गर्म कपड़े भी वितरित किए जाने से सभी प्रसन्न हैं। बात मानते और काम पूरा करते हैं। दुकानदार भी ऐसी खरीदी पर अपना फायदा बिल्कुल नहीं लेते।
मुख्य रूप से संगीता तोमर अपने पीएसई विभाग में पानी संबंधी प्रचार-प्रसार, मीठे पानी के लिए टेस्टिंग, व्यवस्था आदि ही देखती हैं। अभी जुलाई-अगस्त 2021 में भयंकर बाढ़ आई। कुछ बरसात और कुछ ऊपर बने बांधों का पानी छोडऩे पर नदियों के किनारे बसे गांव पानी से घिर गए। घरों में पानी भर गया, तो कहीं मकान गिर गए। फसलें खेतों में गिर गईं। पशु परेशान हो गए। तो अटेर और भिण्ड क्षेत्र के गांवों में गईं। नदियों की बाढ़ पर नजर रखी। लोगों को सुरक्षित स्थान पर रखा गया। उनके रहने, खाने-पीने की व्यवस्था भी कराई। बाढ़ में डूबे जल स्त्रोतों का क्लोरीनेशन एक अभियान की तरह चलाया। बाढ़ में सब कुछ बह जाने की स्थिति में वस्त्रों की व्यवस्था की। संगीता के ऐसे कई काम हैं, जिन्हें वह मन से करती हैं। अब ऐसे लोगों के जुडऩे पर एक संस्था का रूप ही बन गया। जो एक्सीडेंटल और महिलाओं के प्रसव पर खून की कमी पूरी करने बारी-बारी से अपना ब्लड डोनेट करते हैं।
कन्या जन्म पर गाजे-बाजे के साथ अस्पताल से उसके आवास तक ले जाना, अनुष्ठान के साथ लाडली लक्ष्मी को पधरवाना और सारा खर्च स्वयं उठाना संगीता का जुनून है, जिससे कन्याओं के प्रतिशत में वृद्धि हुई है। ऐसे अनुष्ठान उनके मोबाइल में सुरक्षित देखे गए हैं।