डर्टी पॉलिटिक्स का एक और चेहरा

– राकेश अचल


खबर है तो बहुत छोटी, लेकिन इस खबर से देश में चल रही डर्टी पॉलिटिक्स का चेहरा एक बार फिर बेनकाब होता दिखाई देता है। खबर है कि केन्द्र सरकार ने 26 जनवरी को निकलने वाली गणतंत्र दिवस परेड में पंजाब की झांकी को शामिल करने की इजाजत नहीं दी है, क्योंकि पंजाब सरकार झांकी में अपनी जिस योजना को प्रदर्शित करना चाहती है वो केन्द्र की भाजपा सरकार को पसंद नहीं। आपको याद दिला दूं कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है। आम आदमी पार्टी की वजह से ही भाजपा को पंजाब विधानसभा चुनाव में मुंह की खाना पडी थी।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अचानक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और केन्द्र सरकार पर जमकर हमला किया और आरोप लगाया कि सरकार पंजाब से सौतेला व्यवहार कर रही है। मान के मुताबिक, इस बार केन्द्र सरकार की चिट्ठी आने के बाद भगवंत मान सरकार ने पंजाब से तीन मॉडल भेजे थे, जिनमें एक पंजाब के शहीदों का, दूसरा पंजाब की नारीशक्ति और तीसरा पंजाब के ऐतिहासिक विरसे को दिखाता हुआ मॉडल था। मान ने आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार ने तीनों मॉडल को ठुकराते हुए पंजाब की झाकियां परेड में शामिल करने से मना कर दिया। केन्द्र के इस कदम से मुख्यमंत्री भगवंत मान का पारा सातवें आसमान पर है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार हमारे टैक्स के हिस्से का पैसा नहीं देती, हमारी धार्मिक यात्रा के लिए अनुबंध हो जाने के बावजूद ट्रेन देने से मना कर देते हैं। मान ने आशंका जताई कि केन्द्र सरकार राष्ट्रगान से कहीं पंजाब का नाम भी ना निकाल दे।
केन्द्र और राज्य के बीच का ये पहला विवाद नहीं है। इससे पहले केन्द्र गैर भाजपा शासित राज्यों को अपने तरीके से परेशान करती आई है। कभी किसी राज्य के लिए चावल का कोटा जारी नहीं किया, तो कभी किसी राज्य को मिलने वाली दीगर सहायता रोक दी। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा के एक दशक के कार्यकाल में केन्द्र और राज्य संबंधों पर बुरा असर पडा है। एक तरह से आप कह सकते हैं कि देश का संघीय ढांचा चरमरा चुका है। पंजाब की झांकी को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल न किए जाने पर केन्द्र की ओर से कोई सफाई नहीं आई, लेकिन पंजाब भाजपा के अध्यक्ष सुनील जाखड ने पंजाब की झांकियां शामिल न करने वजह बताई है। जाखड ने कहा है कि झांकी को खारिज करने का कारण ये है कि झांकियों के अंदर अरविन्द केजरीवाल और भगवंत मान की तस्वीरें हैं।
भाजपा की केन्द्र सरकार और राज्यों के बीच विवाद नए नहीं हैं। झांकियों के मामले में तो खासकर ऐसे विवाद हुए है। मध्य प्रदेश में जब डबल इंजिन की सरकार थी तब भी मप्र की झांकी अस्वीकार कर दी गई थी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और केन्द्र सरकार के बीच का विवाद तो जग जाहिर है। दिल्ली में उप राज्यपाल के अधिकारों को लेकर विवाद तो सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे है और ये अंतहीन विवाद हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केन्द्र से चलाई जाने वाली योजनाओं का विरोध ही नहीं किया, बल्कि यह भी कहा कि राज्यों को अपनी योजना चलाने की आजादी होनी चाहिए। उनका आरोप है कि केन्द्रीय योजनाओं में औसतन 40 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को व्यय करना पडता है, लेकिन श्रेय केन्द्र सरकार को जाता है। आपको याद होगा कि केरल के अलावा जब मप्र, राजस्थान में भी जब कांग्रेस की सरकारें थीं उस समय भी इसी तरह के विवाद खडे हुए थे। कर्नाटक ने भी केन्द्र के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ऐसे समय में जब देशों की अर्थ व्यवस्था दुनिया के साथ समेकित हो चुकी हो, जब किसानों की उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए कृषि-बाजार को देशव्यापी बनाने की कवायद चल रही हो, जब केन्द्र की नीतियों का राज्यों में व्यापक प्रभाव पड रहा हो तब यह तनाव विकास और जनकल्याण को बुरी तरह अवरुद्ध कर सकता है।
मुझे लगता है कि भाजपा के विस्तार के कारण ही ममता और नीतीश भी हमेशा उससे सशंकित रहते हैं, भले ही चुनाव के कारण उन्हें साथ आना पडता हो। ऐसे में क्या अब समय नहीं आ गया है, जब संविधान में व्यक्त किए गए केन्द्र-राज्य संबंधों को एक बार फिर से परिभाषित किया जाए, ताकि सार्थक क्षेत्रीय भावनाएं प्रतिक्रियात्मक बहुसंख्यक वाद की बाढ में बह न जाएं? कांग्रेस की प्रस्तावित न्याय यात्रा में केन्द्र और संघ के दिनोंदिन खराब हो रहे रिश्तों पर भी बात होना चाहिए। भाजपा के तेवर देखते हुए निकट भविष्य में केन्द्र-राज्यों के रिश्तों में सुधार की संभावना बहुत कम है।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा गणतंत्र दिवस परेड के लिए राज्य की झांकी को अस्वीकार करने के लिए केन्द्र सरकार की आलोचना करने के एक दिन बाद अकाली दल प्रमुख सुखबीर बादल ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से गौरवशाली, देशभक्त और वीरतापूर्ण पंजाब और पंजाबियों के खिलाफ भेदभाव के खिलाफ हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। आपको याद होगा कि अकाली पहले भाजपा के साथ ही थे, लेकिन किसान आंदोलन की वजह से दोनों के रिश्ते दरक गए थे। बादल ने कहा, ‘महान गुरू साहिबान, साहिबजादों और शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह, सरदार करतार सिंह सराभा, सरदार उधम सिंह जैसे स्वतंत्रता संग्राम के अनगिनत नायकों और शहीदों की विरासत को उजागर किए बिना किसी भी राष्ट्रीय कार्यक्रम को कैसे पूरा माना जा सकता है’। बादल ने कहा है कि लाला लाजपत राय और शहीदों की भूमि के साथ इस अन्याय के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान की जानी चाहिए और उसे जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।