फसल के विकास और पैदावार में महत्वपूर्ण योगदान देता है जीवामृत : डॉ. सिंह

प्राकृतिक कृषि से होगी किसानों की लागत कम

भिण्ड, 24 दिसम्बर। जिले के किसानों में प्राकृतिक कृषि के प्रति जागरुकता पैदा करने और प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र किसानों के बीच जाकर प्राकृतिक खेती जागरुकता कार्यक्रम चला रहा है। इसी क्रम में लहार विकास खण्ड के ग्राम वेसपुरा में प्राकृतिक खेती जागरुकता प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन का आयोजन किया गया, जिसमें केन्द्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को जीवामृत बना कर दिखाया।
इस अवसर पर प्रगतिशील कृषक रामेन्द्र सिंह राजावत की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. एसपी सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अवधेश सिंह एवं डॉ. करनवीर सिंह ने किसानों के बीच जाकर विस्तार से प्राकृतिक खेती की बारीकियां समझाई। प्रशिक्षण के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा गांव में स्थापित प्राकृतिक खेती इकाई के माध्यम से मौके पर ही जीवामृत बनाकर दिखाया गया।
केन्द्र प्रमुख डॉ. एसपी सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती में बहुत कम लागत आती है। कोई भी किसान देशी गाय का गोमूत्र, गोबर, बेसन और गुड़ लेकर जीवामृत बना सकता है। एक एकड़ खेत के लिए एक 200 लीटर के ड्रम में बना जीवामृत पर्याप्त रहता है, जिसे स्प्रे अथवा सिंचाई के पानी के साथ आसानी से प्रयोग किया जा सकता है। जीवामृत खेत में रासायनिक उर्वरकों जैसे कि यूरिया, डीएपी, एनपीके आदि का कार्य करते हुए पौधों के विकास और पैदावार में महत्वपूर्ण योगदान देता है। जीवामृत को लगातार लगाते रहने से अलग से उर्वरक लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अवधेश सिंह ने बताया कि एक 200 लीटर के ड्रम में जीवामृत बनाने में मुश्किल से 200 का खर्च आता है, जबकि एक एकड़ में यदि डीएपी, यूरिया आदि का खर्चा जोड़ा जाए तो यह दो हजार के ज्यादा बैठता है। इस हिसाब से प्राकृतिक कृषि सस्ती और स्वास्थ्य के लिए बहुत ही बेहतर है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रामेन्द्र सिंह राजावत ने प्राकृतिक कृषि को अपनाकर खेती से अपनी आमदनी बढ़ाने की अपील की। कार्यक्रम में रामशरन नगायच, मेघसिंह, रवीकांत शर्मा, रामलखन, वीरसिंह, रामबिहारी आदि के अलावा गांव के चार दर्जन से अधिक किसानों ने भाग लेकर प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी हांसिल की।